Thursday, July 4, 2013

अनबूझे प्रश्न



 अनबूझे प्रश्न

जिन्दगी की राह पर---
दौड़ता है कोई……


पावों में शूल से ड़ते हैं प्रश्न---
जलती रेत पर,
लहू टपकता है__
भाप बन उड़ जाते हैं उत्तर!
पीछे रह जाते हैं __
अनबूझे प्रश्न....


-हरिचन्द

बौद्धिक करूणा



बौद्धिक करूणा

मिल गया था मुझको वो
दीन-हीन, दास व्यवस्था का,
सदियों से पहने गुलामी की बेडि़यां।

सुनकर दो शब्द करूणा के---
देखकर आखें दो सहानुभूति-भरी---
ऐसा आया उल्लास कि उसमें---
सदियों से दबी खामोश आवाज---
अचानक निकली बाहर/ तोड़ते हुए  सारे बांध
एक उग्र आक्रोश ,  एक तीखापन लिए---
बहुत हो चुका---
हम संघर्ष करेंगे अन्याय के खिलाफ,
अब और नहीं रहेंगे खामोंश,
निरीह जानवरों की तरह,
आखिर इंसान हैं हम भी।

काश ! वो जान पाता---
मेरे पास देने को कुछ नहीं,
सिवाय बौद्धिक करूणा के,
जिसमें आक्रोश की भी शक्ति नहीं।

धन्य हे उसका आक्रोश---
अहसास दिलाता है जो मुझे,
मेरी नपुंसकता का,
निरर्थकता का!


-अशोक कुमार

Wednesday, July 3, 2013

जीवन सोचकर नहीं जिया जाता



जीवन सोचकर नहीं जिया जाता

इस बार-
फिर बंसन्त आया,
फिर से फूल खिले,
फिर कोयलिया बोली,
फिर से आम बौराए,
फिर झरे फूल,
फिर से सूखे बौराए दिन आए,
फिर अहसास बढ़ा व्यर्थता का।
खोजकर सार्थकता किसी अर्थ में
फिर से सपनों में खोया।
किन्तु फिर.......
वहीं अनबुझा प्रश्न सपनों में भी!
फिर संदिग्ध हो उठी सार्थकता__

बुद्धिवादी केंकड़ें !
ऐसे फिर ....  फिर.... करते___
जीवन तुम जी नहीं सकते !
जीवन सोच कर नहीं जिया जाता !
हां ! जीवन का बोझ ढोते रहने के लिए___
खयाल अच्छा है!
 

-अशोक कुमार